Monday, July 14, 2014

बूँद

हाँ! मिल तो सकता है
ये असीम वैभव,
चंद सतही प्रयासों से
पर उस वैभव से क्या
जो न मिटा सके पिपासा
अंतस की रत्तीभर भी...

हाँ! जुड़ तो सकते हैं
रिश्ते,
दुनिया के तमाम लोगों से
पर उन रिश्तों से क्या
जो दिखे चमकदार
पर हों खोखले
बिल्कुल अंदर से...

कुछ ऐसे ही
हम पा तो सकते हैं
प्यार, सम्मान और अपनापन
तनिक रुतबा पाके
पर इन तमाम जज़्बातों से क्या
जिनमें कोरी औपचारिकताओं
के सिवा और कुछ न हो...

कैसे बतायें तुम्हें कि
एक कतरा नम बिन्दु की प्यास
बिन्दु से ही बुझती है
सिन्धु से नहीं..
और धरती पे मौजूद असीम
पानी के बावजूद
चातक निहारता है बस 
स्वाति में गिरी
उस एक बूँद को
जो मिटाती है क्षुधा
उस पूरे जीवन की...

उस बूँद के अर्थ का आकलन
क्या कर सकती हैं
सहस्त्रों बौछारें मिलकर भी...
या फिर जुड़ सकता है
सिरा रुहानी जज़्बूातों का
एक मर्तबा बिखरने पर....


हाँ, सब ठीक हो सकता है
गर एक दफा फिर 

मिले वो 
'बूँद'


ज़रा देखो न बाहर!
बूँदें तो बहुत बरस रही हैं
 इस बरखा में,
पर न है वो स्वाति नक्षत्र
और न है इन बूँदों में नमी
जो मिटा सके चातक की प्यास।।

Sunday, June 15, 2014

खुश्क मानसून

याद है न
वो जेठ की गर्मी के बाद
अषाढ़ में गिरी बारिश की पहली बूँद
भिगो देती है जो तप्त भूमि को
कोई अमृत बनके
और उस अमृत को पा
खिलखिला उठती है धरती
किसी चंचल तरुणी की तरह...

सुर्ख चुभन भरी धूप के बाद
घिर आती है काली घटा
और छा जाता है नशा
हवा के झोंकों में भी...
बंजर हो चुकी ज़मीन
फिर ओढ़ लेती है हरी ओढ़नी
और इठलाती है किसी
नवविवाहिता स्त्री की तरह....

प्यास के मारे दूर पलायन कर चुके
सारे पंछी भी लौट आते हैं
अपने गलीचे में
और तमाम वृक्ष भी अपनी 
सरसराहट से मचाते है शोर
अहंकारी बनकर,
भुला देते हैं सारे दर्द
जो मिले थे ग्रीष्म के सख़्त रवैये से...

सबको कितनी खुशियां देता था
मानसून,
पर तब भी इस धरा, पवन, 
आसमाँ और कुदरत के बीच 
हमसे ज्यादा खुश   
और कोई न होता था
जो बादलों के घिरने पे
मौसम बदलने पे
हवाओं के चलने पे
बूँदों के गिरने पे
चहक उठते थे 
अपनी ही खुमारी में...

और थााम इक दूजे का हाथ
पकड़ लेना चाहते थे
बारिश की हर इक बूँद को
किसी नादान बच्चे की तरह..
अपनी आँखें मीच
खुले आसमां के नीचे
भिगो लेते थे अपने लवों को
उन बूँदों से...
और यकीन मानो
वो बूँदें,
लवों से उतरती हुई
सीधे ज़हन को तर करती थी
आहिस्ता-आहिस्ता...
या फिर कभी 
इकदूजे से सटके
करते थे जद्दोज़हद बचने की
बेरहम बरखा से
एक ही छाते के नीचे...


पर देखो!
अब भी घटा घिरती है
बिजली तड़कती है
हवाएं चलती है
बरखा मचलती है
और हर बार की तरह
वैसे ही मानसून
दस्तक देता है..
किंतु!
अब इसने भिगोना
बंद कर दिया है
और अब बारिश के बीच
चलते हुए भी मुझे
छाते की ज़रूरत नहीं होती.......

Thursday, June 5, 2014

भ्रम का सौंदर्य

बड़ी बेशर्म, खुदगर्ज
और चालबाज़
होती है ज़िदंगी
जो
बड़ी आसानी से पुराने
अहसासों
रिश्तों
और किये हुए वादों
को भुला बढ़ती चली जाती है आगे..

नये जज़्बात, संबंध और
कसमों की परतें
बड़ी आसानी से उन
पुरानी चीज़ों पे डिस्टेंपर पोत देती है
और नई नज़दीकियों के
कारण खुद ब खुद
ज़िंदगी में चमक आ जाती है
हाँ!
भले ही उस डिस्टेंपर के अंदर
पड़ी रूह की दीवार में सीड़न आती
रहती है आहिस्ता-आहिस्ता...


पर ज़िंदगी कहाँ किसी को 
हमसफर मान ठहरा करती है
मिलन का मकसद ही जुदाई है
और वही है उसका अंतिम सत्य
किंतु
उस मिलन के
सौंदर्य से जन्मी चमक में
अक्सर
हो जाते हैं हम अंधे कुछ ऐसे
कि हर मिलन की शुभ्रता
हमें शाश्वत जान पड़ती है
और यही भ्रम दुनिया के हर यथार्थ
से अधिक खूबसूरत लगता है....

अफसोस!
स्वप्न चाहे कितना ही सुंदर क्युं न हो
भ्रम चाहे कितना भी प्रशस्त क्युं न हो
छाया कितनी भी शीतल क्युं न हो
स्थायित्व का वास उनमें कभी नहीं होता
साहिल पे आई समंदर की लहरें
हाथों को छूने वाली बारिश की बूँदें
और ज़ुल्फों को बिखराते हवा के झोंके
चंद लम्हों को ही खुशनुमा करते हैं...

पर हम
उन लम्हों की बेसुधी में ही 
खुद को किसी ख़याली शिखर 
का शिरोमणि समझ
अपनी ज़मीं से कदम उठा लेेते हैं
और अंततः
जीवन सफ़र की इस रहनुमाई में 
नित बदलते जज़्बातों के रंगों से
हमारे हाथ कोरे ही रहते हैं
और इस बेइंतहा बदलाव के चलते
इक दिन 
उन हाथो से उम्मीद की लकीरें
भी मिट जाती हैं।।

Saturday, May 24, 2014

फिर इक बार...

चलो फिर करते हैं
कुछ बेबुनियाद सी बातें
जिनमें न कोई अर्थ हो
न भावों का गर्त हो
न लम्हों का विवर्त हो
भले भ्रम का ही आवर्त हो...

फिर इक बार चलते हैं
जज़्बातों के उस सफ़र में
जहाँ जागा दिल में प्यार हो
तुमसे मिलने का इंतज़ार हो
मुश्किल से फिर इज़हार हो
और लवों पे इकरार हो....

चलो पीते हैं फिर 
वो यादों भरा अर्क का प्याला
जहाँ बार-बार लड़ाई हो
तुमसे रुसवाई हो
हंसी और रुलाई हो
मिलन हो-जुदाई हो...

हाँ चलो न! छूते हैं फिर
उस बेसुधी के गगन को
जहाँ उनींदी आंखो से दिल परेशान हो
बेहुदी आदतें करती हैरान हो
रतजगों के बावजूद खुशनुमा विहान हो
नासमझ ख्वाबों का अपना आसमान हो....


पर क्या बाकई अब लौटना मुमकिन होगा
या बेरहम हक़ीकत भरा ही हरदिन होगा
अब लौटना है उसी भ्रम की धरा पे
जो हो समझ व वैभव के सख़्त यथार्थ से दूर
और हो उन्हीं नादानियो के रस से भरपूर
पर अफ़सोस हम अपने असल में ही
कुछ ऐसे जड़ गये
मानो जीते-जी ही 
किसी ताबूत में गड़ गये
मौकापरस्ती की लत में हो अंधे 
न जाने क्युं इतना, हम आगे बढ़ गये...
न जाने क्युं  इतना, हम आगे बढ़ गये।।।

Wednesday, May 14, 2014

दोहरी तहज़ीब

हाँ देखा है
उन शराफत के ठेकेदारों को
जो देते हैं नसीहतें
हत्या
लूट
बलात्कार और
ऐसे ही कुछ दूसरे अपराधों पर
बड़ी बेबाकी से....
और देखे जाते हैं
पैरवी करते इनके विरुद्ध
तमाम अदालतों, दफ़्तरों और
सरकारी आयोगों में जाकर...


पर मेरे सवाल हैं इन्हीं
सफेदपोशों से, 
जिनकी
बाहर से चमचमाती 
बासलीका मिनारों के अंदर ही होते है
सबसे ज्यादा गुनाह

जहाँ हर घड़ी बड़ी ख़ामोशी से होते हैं
जज़्बातों के क़त्ल,
मज़हब-बिरादरी और रुतबे की
कुछ बेबुनियाद सी दीवारें खड़ी कर..
और लूटा जाता है रिश्तों की इज़्जत को
ऐसी ही कुछ रस्मों-रिवाज़ के नाम पे
और हाँ,
अपने दोहरे अलामत के ज़रिये
बड़े ही संजीदा हो करते हैं
शराफ़त को ही खुले बाज़ार नंगा...
फिर भी इनकी कांख से
बहती है बरहमिश
शाइस्तगी की गंगा...

अफसोस!
ऐसे तमाम अपराधों के खिलाफ़
न कोई वकालत है
और 
न कोई अदालत
क्युंकि
इस जहाँ में
ऐसा कोई बाशिंदा ही
नज़र नहीं आता
जो हत्यारा न हो
और जिसने न किया हो 
किसी न किसी तरह
अपने या किसी गैर के
जज़्बातों का क़त्ल....
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