ख्वाहिश,
तुम्हें पाने की
दिल में सजाने की।
ख्वाहिश,
आँसू बहाने की
खुलके मुस्कुराने की
बतिया बनाने की।
ख्वाहिश,
गीत गुनगुनाने की
झूमने-झूमाने की
दूनिया पे छाने की।
दिल के ज़र्रे-ज़र्रे में
ये ख्वाहिशें समायी
ज़िंदगी में छायी..
पर,
नादान ख्वाहिशें ये
हालात नहीं जाने
न अपनों की माने
दस्तूर जमाने के
न तनिक भी पहचाने।

हैं रिवाज़ों के बंधन
हज़ारों हैं अड़चन
लोगों की बातें
बढ़ाती हैं तड़पन।
फिर भी ये ख्वाहिशें
बढ़ती ही जाती
चैन नहीं पाती
कितना सताती
सच,
ये ख्वाहिशें
बड़ी बदतमीज होती हैं।।
