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Wednesday, October 30, 2013

रोशनी की चकाचौंध

क्यूं
अफसोस करें हम
कि कुछ भी न होता 
मन का मेरे
क्युं तन्हा
रहे हम हरदम
कि जीवन को घेरे
घनघोर अंधेरे...


क्युं
अपने नसीब को कोसें
कि जो चाहें
वो मिले न हमको
क्युं नाराज़
खुदा से हों
जब सुकुं मिले
न आवारा दिल को...

यूँ अफसोस जताके
हम,
तौहीन करें
अपने जीवन की
तौहीन करें
अपनी साँसों की,
और
वक्त के मृदु संगम की..

सच तो ये है
सनम! सुनो तुम
मिले वही
जिसके लायक हम
गर हो जाये 
सबकुछ मन का
तो 
बात याद रखना वो पुरानी
जिसे सुनाया करती थी,

अक्सर वो काकी
बड़ी सयानी...
कि 
जिंदगी हमारे धीरज का
इम्तिहान,
युंही बस लेती है
और
ज़रूरत से ज्यादा
रोशनी भी
अंधा बना देती है।
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