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Thursday, October 17, 2013

भावुकता बनाम संवेदनशीलता

अक्सर
लोगों के ठहाके देखकर भी
मुझे हँसी नहीं आती
अक्सर
जमाने में दर्द देखकर भी
मेरी अंखियाँ आँसू नहीं बहाती..
अक्सर
सुंदर खूबसूरत नगमों पे भी
मैं झूमता नहीं हूँ
अक्सर
सुनहरी यादों के साये में
मैं घूमता नही हूँ।


इस कद़र मेरी बेरुखी देख 
वो आसानी से कह जाते हैं
कि मुझे प्यार नहीं है
किसी का इंतज़ार नहीं है
इक सलोना दिल नहीं है
खुशनुमा महफिल नहीं है...

पर,
करूँ भी मैं क्या

इसमें कसूर न कोई उनका
वो मेरे लफ्ज़ सुनते हैं
खामोशी नहीं!
और
 मेरी ख़ामोशी
बड़ी खामोशी से
ये बताना चाहती है
कि सनम!
क्षणिक भावुकता 
और परिपक्व संवेदनशीलता में
फ़र्क होता है.....

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