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Friday, August 23, 2013

बारिश

हसरत थी
इस दिल की ज़मीं पे
प्यार का गुल खिलाने की,
एक गुस्ताख़ चाहत थी
आसमां के चाँद को
ज़मीं पे लाने की।
ख़्वाहिश थी
कि अहसास
की बारिश में मन 
भीग जाए,
पतझड़ सी तन्हा
ये फ़िज़ा
बीत जाए।


पर इन नासमझ 
ख़्वाहिशों की भी
अजब दास्ताँ है...
मोहब्बत की बारिश से
मन भी भीगा
पतझड़ भी बीता
बंजर ज़मीं का
सूखापन भी रीता..



पर बारिश तो बारिश है 
सनम!
जिससे भीग तो जाती हैं
हथेलियाँ
पर हाथ कुछ
नहीं आता।

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