आते-मुस्काते
बतियाते-खिलखिलाते
पर जाते-जाते
जाने ये क्यूं कह जाते
कि कहीं हमने आपका कीमती,
वक्त तो नहीं लिया..
कि कहीं हमने आपको
डिस्टर्ब तो नहीं किया।
फिर क्या था,
धीरे-धीरे
हम उनके डिस्टर्ब करने
में खोने लगे
और
उनके डिस्टर्ब न करने से
और भी ज्यादा डिस्टर्ब
होने लगे
पर वो अब भी न समझे
और हमसे ये कहते रहे
कि कहीं हमने आपका कीमती,
वक्त तो नहीं लिया..
कि कहीं हमने आपको
डिस्टर्ब तो नहीं किया।
पर हमें भी समझ न ये आये
जो जाके उन्हें बताए
कि सांसों के चलने से
हसरत मचलने से
दिल के धड़कने से
कोई 'डिस्टर्ब नहीं होता'।।

