Saturday, May 14, 2016

वो लाड़ला बेटा

उस रोज़ जब
रेलवे स्टेशन पर
वो आई थी छोड़ने
अपने इकलौते बेटे को
तो
उसने अपने दोस्तों के आने से पहले
कहा था अपनी माँ से
लौट जाओ तुम यहाँ से।

माँ की फटी साड़ी,
पैरों में घिसी चप्पल
और उसका थका चेहरा
पहुंचा रहा था शायद
उस बेटे की
इज्जत को ठेस।

पर वो बेशर्म माँ,
देखना चाहती थी
अंतिम घड़ी तक 
अपने लाड़ले बेटे का मुखड़ा
ट्रेन के छूट जाने से पहले।

एक थैली में
अचार-पापड़ का डिब्बा,
बेसन के लड्डू
और कुछ पूड़ियों के संग
रखी थीं उसने गर्मी से बचने की हिदायतें
उस रोज़।

पर, 
इन तमाम हिदायतों से परे
वो बस भगा देना चाहता था 
अपनी माँ को उस स्टेशन से दूर।

फिर क्या,
अपने बेटे की जिद से मजबूर
वो माँ चल दी वहां से
पर जाते-जाते भी कहती रही
कि न निकलना धूप में बाहर
न खाना होटलों का बासा खाना
और लौट आना परीक्षा के बाद तुरंत ही।

माँ की इन नसीहतों पर झल्लाकर
आखिर उसकी जुवां ने यह कह ही दिया
'मैं कोई बच्चा नहीं..अब जाओ भला यहाँ से'

कुछ रोज़ बाद
शायद मदर्स डे पर
की पोस्ट फेसबुक पे उसने,
माँ के साथ ली गई एक सेल्फी...।
और किसी शायर की शायरी के साथ
लिखा नीचे उसके
"वर्ल्ड्स बेस्ट मॉम"

Saturday, April 9, 2016

ज़िद, जुदाई और हम

बड़ा कमजोर होता है
अहसास,
जो रिश्तों को जोड़ता है
जो चाहतों का रुख
संबंधों की तरफ
मोड़ता है।

बड़े कमजोर होते हैं
बंधन,
जो दो हाथो को थामते हैं
जो दिलों के तार को
कच्चे धागों में
बांधते हैं।

अक्सर
ये बंधन
ये अहसास
ज़िंदगी की उलझनों में
रास्तों की अड़चनों में
टूट जाते हैं...
जाने कैसे रिश्तों का साथ
अपनों के हाथ
आपसी टकरावों में
छोटे से घावों में
छूट जाते हैं।

पर गुजारिश है तुमसे
ज़िद छोड़ो ऐ दोस्त!
कोई अपना गर यूँ
रुठेगा तुमसे
तो भुला सारे शिकवे
मना लो उसे दिल से...
क्युंकि...ज़िद की इस जंग में...अक्सर।
हम हार जाते हैं
और 
जुदाई जीत जाती है।

Monday, October 19, 2015

सृजन का सच

घनघोर असंतुष्टि,
अतृप्ति 
और महसूस किये
किसी अव्यक्त दर्द से
पैदा होते हैं
कुछ बेतरतीब से शब्द,
जो कुछ ऊटपटांग से वाक्यों का
लिबास पहन बन जाते हैं
महसूसियत के फरमान।

और दिखने लगते हैं
कुछ-कुछ कविता जैसे
जिन्हें पढ़-लिख, सुन-सुना
करने लगता हूँ मैं गुमान
खुद के शायर होने का,
और भ्रम के किसी 
खयाली आकाश में
हो जाता हूँ तृप्त
कागज़ों से अपने ज़ख्म पोंछकर।

किंतु ये सृजन का भ्रम
बस चंद लम्हों के लिये ही
मेरी तृष्णा को दुलारता है
और फिर यथार्थ का कड़वा सच
कर देता है मेरे ज़ख्मों को हरा
जिससे प्रेरित हो 
कर बैठता हूँ मैं
पुनः एक और 
'सृजन'

अतीत के असंख्य अहसासों
और उनसे पैदा
इन फजूल के अल्फाजों की
भूलभूलैया में
उलझा हुआ
मैं अपना वर्तमान नहीं
सुलझा पाता।

उन ज़ंग लगे जज़्बात से
भले हो रहा है
'सृजन'।
पर
अवरुद्ध इसने कर दिया
स्वयं का निर्माण
अब।

गौर से देखो
तो जरा!
असल में
इस बंजर भूमि पे पड़े
'अंकुर' से
नहीं निकलती कोई
सृजन की पौध।

Tuesday, September 1, 2015

बेरहम बरखा

उस बाग को खुदवाकर मैंनें
धंस दिया था गहरे तक
ईंट का चूरा
और फिरवाकर रोलर
कई मर्तबा
बना दिया था सपाट, बंजर
उस जमीं को..
जहाँ खिला करती थीं
तेरी चाहतों की कली कभी,
तेरी ख़्वाहिश और नुमाइश
की फुलवारी।



पर इस घिर आई घटा ने
बरखे बदरा ने
फेर दिया पानी
मेरी उन तमाम कोशिशों पे।

लो
फिर उग आई उस ज़मीं पे
तेरी यादों की दूर्वाएं,
टरटराने लगे
बगिया की उजड़ी पड़ी बागड़ में
उन की हुई बातों के 
असंख्य मेंढक
और
लगे हैं निकलने
बारिश में भीगे 
वे बीते लम्हों के
कीट पतंगे।

ये बारिश
भले बुझा रही है सैंकड़ों की तपन
पर मेरी रूह को
कतरा-कतरा जलाते है
इन गिरी हुई बूंदों के नाजुक छींटे।
ये बूंदें
दिल की सुर्ख ज़मीं पे गिर
उड़ा रही हैं बेवशी की सौंधी खुशबू
कर रखा है बेचैन
इन रुसवाईयों के कुकुरमुत्तों ने।

अरे! आना है तो आये न,
पर कमबख़्त ये बारिश
अकेली क्युं नहीं आती....

Friday, June 19, 2015

अव्यक्त की अभिव्यक्ति !!!

तप्त दुपहरी के बीच
ज्यों होती है तरुओं की
सुनहरी छांव।
भटका राही 
लंबी दूरी तय कर
पा लेवे ज्यों अपना गांव।। 

अथाह मरुस्थल में हो
ज्यों
भरा नीर का कुण्ड।
अथवा
किसी अनजान सफर पर
मिले अपनो का झुण्ड।।


ये सब वे चीज़ें हैं
जिनका लगता न 
कभी भी मोल
चमक नहीं, चाहत ही बस
तय करती इनका तौल।

बीच समंदर मिले थे तुम
बनकर के कोई द्वीप।
था संयोग अजब ये वैसा
मानो स्वाति में मिला
बूंद को सीप।

फिर निष्कंट राह में जाने
आयी कैसी ये विष बेल।
उड़ा ले गई मुझसे मेरा सब
क्या अजब ये कुदरत का खेल।।

कभी धूप-कभी छाया
क्या ऐसी ही जीवन की रीत।
क्युं वीराने में खो जाते
कभी महफिलों में गूंजे 
जो गीत।

हुई उपेक्षा उस अंचल में,
उम्मीद के थे जहाँ
खड़े किले।
मिला अंधेरा उन गलियों में
जहां प्रेम के 
दिये जलें।।

दूर सभी हों हसरत मेरी
हो न संग की अब ख्वाहिश।
वीतराग होकर वसुधा पे
न चाहूं कोई फरमाईश।।

हो उदार-निरपेक्ष वृत्ति बस
करुं स्वयं का आलोचन।
दिखे दोष अन्यत्र कहीं न
यही एक बस आलापन।।

तुम थे, तो ही सुख था
मृगतृष्णा हो मेरी ये दूर।
थमे खोज जगविषयों की अब
न होना ही चाहूँ 
 मशहूर।।

थमे  गीत-थमे हर कविता
अव्यक्त रहूं निष्चेष्ट सदा।
स्वस्वरूप में थिर होकर
लौटूं न जगत में कहीं-कदा।।
लौटूं न जगत में कहीं-कदा.....
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