Sunday, September 21, 2014

कुछ ऐसी भी बेवफाई

भंवरा,
मोटी सी काष्ठ की दीवार को
काट कर भी अपना घर बना लेता है
पर नाजुक सी सुमन की पंखुरी को 
नहीं भेद पाता
और तोड़ देता है अपना दम
अंदर ही अंदर घुट कर..
पता है क्युं?
क्योंकि
उसे लगती है बेवफाई
यूँ उस पुष्प को चुभन देने में
जिससे उसने पराग पाया।


ये पतंगे,

बारबार तपने के बाद भी
उस दीपक की ओर ही डोलते हैं
और तोड़ देते हैं 
इसी तरह अपना दम
उस दीपक की लौ में जलकर
पता हैं क्युं?
क्योंकि
उन्हें लगती है बेवफाई
उस चिराग से दूर जाने में
जिससे पाते हैं वो आभा।


और कुछ यूं ही
वो जंगल का मृग
संगीत की धुन पर
हर बार फंस जाता है
शिकारी के चंगुल में
पर फिर भी नहीं छोड़ता
अपना संगीत प्रेम
पता है क्युं?
क्योंकि
उसे लगती है बेवफाई
जीवन के स्वार्थ पर
सरगम से दूरी बनाने पर।


बस कुछ युं ही
भले जीवन की 
अपनी ही व्यक्तिगत वजहों से
चुना है तूने अपना रास्ता
और
की है मुझसे भी गुहार
चुनकर अपना पथ
आगे बढ़ने की।
पर लाख तेरी याद में
तपने के बाद
और सहकर
अनंत पीड़ा भी
मुश्किल है तूझे भुलाना...
मुझसे बनाई गई दूरियों का
इक अरसा बीत जाने पर भी
तुझे छोड़ किसी और के बारे में
सोचना 
मुझे तुझसे बेवफाई लगती है।

Monday, August 18, 2014

झूठ का सच

कुछ किताबी पन्नों 
के पलटने से
और अनायास ही बादलों 
के गरजने से..
महज़ वो नहीं होता
जो आंखों में झलकता है।

बेमौसम पत्तों 
के झड़ने से
या फूलों के 
बिखरने से
बस वो नहीं मिलता
जो बगिया में महकता है।

गगन में खग
के उड़ने से
या लव पे अश्क़
गिरने से
सिर्फ वो नहीं रुकता
जो दिल में ठहरता है।

ये रब की हरकतें हरपल
बयां करती बहुत कुछ हैं...
पर न बंदा कहीं ऐसा
जो ये सबकुछ समझता है।

हंसी जितनी भी होंठो पे
हैं झूठी सभी फिर भी
ये इंसा जाने क्युं ऐसी
मुस्कुराहट 
को तरसता है।

सुनो! तुम भी ज़रा मेरी
इस अव्यक्त कथनी को
जो कहती सदा सब से
कि खुशियों के पथ पे अब,
ये मन
अक्सर टहलता है।

सुनो-समझो ज़रा मेरे
उस झूठ के सच को
जो दिल के टूटने पर भी,
कहता
कि न कुछ फर्क पड़ता है।

Monday, July 14, 2014

बूँद

हाँ! मिल तो सकता है
ये असीम वैभव,
चंद सतही प्रयासों से
पर उस वैभव से क्या
जो न मिटा सके पिपासा
अंतस की रत्तीभर भी...

हाँ! जुड़ तो सकते हैं
रिश्ते,
दुनिया के तमाम लोगों से
पर उन रिश्तों से क्या
जो दिखे चमकदार
पर हों खोखले
बिल्कुल अंदर से...

कुछ ऐसे ही
हम पा तो सकते हैं
प्यार, सम्मान और अपनापन
तनिक रुतबा पाके
पर इन तमाम जज़्बातों से क्या
जिनमें कोरी औपचारिकताओं
के सिवा और कुछ न हो...

कैसे बतायें तुम्हें कि
एक कतरा नम बिन्दु की प्यास
बिन्दु से ही बुझती है
सिन्धु से नहीं..
और धरती पे मौजूद असीम
पानी के बावजूद
चातक निहारता है बस 
स्वाति में गिरी
उस एक बूँद को
जो मिटाती है क्षुधा
उस पूरे जीवन की...

उस बूँद के अर्थ का आकलन
क्या कर सकती हैं
सहस्त्रों बौछारें मिलकर भी...
या फिर जुड़ सकता है
सिरा रुहानी जज़्बूातों का
एक मर्तबा बिखरने पर....


हाँ, सब ठीक हो सकता है
गर एक दफा फिर 

मिले वो 
'बूँद'


ज़रा देखो न बाहर!
बूँदें तो बहुत बरस रही हैं
 इस बरखा में,
पर न है वो स्वाति नक्षत्र
और न है इन बूँदों में नमी
जो मिटा सके चातक की प्यास।।

Sunday, June 15, 2014

खुश्क मानसून

याद है न
वो जेठ की गर्मी के बाद
अषाढ़ में गिरी बारिश की पहली बूँद
भिगो देती है जो तप्त भूमि को
कोई अमृत बनके
और उस अमृत को पा
खिलखिला उठती है धरती
किसी चंचल तरुणी की तरह...

सुर्ख चुभन भरी धूप के बाद
घिर आती है काली घटा
और छा जाता है नशा
हवा के झोंकों में भी...
बंजर हो चुकी ज़मीन
फिर ओढ़ लेती है हरी ओढ़नी
और इठलाती है किसी
नवविवाहिता स्त्री की तरह....

प्यास के मारे दूर पलायन कर चुके
सारे पंछी भी लौट आते हैं
अपने गलीचे में
और तमाम वृक्ष भी अपनी 
सरसराहट से मचाते है शोर
अहंकारी बनकर,
भुला देते हैं सारे दर्द
जो मिले थे ग्रीष्म के सख़्त रवैये से...

सबको कितनी खुशियां देता था
मानसून,
पर तब भी इस धरा, पवन, 
आसमाँ और कुदरत के बीच 
हमसे ज्यादा खुश   
और कोई न होता था
जो बादलों के घिरने पे
मौसम बदलने पे
हवाओं के चलने पे
बूँदों के गिरने पे
चहक उठते थे 
अपनी ही खुमारी में...

और थााम इक दूजे का हाथ
पकड़ लेना चाहते थे
बारिश की हर इक बूँद को
किसी नादान बच्चे की तरह..
अपनी आँखें मीच
खुले आसमां के नीचे
भिगो लेते थे अपने लवों को
उन बूँदों से...
और यकीन मानो
वो बूँदें,
लवों से उतरती हुई
सीधे ज़हन को तर करती थी
आहिस्ता-आहिस्ता...
या फिर कभी 
इकदूजे से सटके
करते थे जद्दोज़हद बचने की
बेरहम बरखा से
एक ही छाते के नीचे...


पर देखो!
अब भी घटा घिरती है
बिजली तड़कती है
हवाएं चलती है
बरखा मचलती है
और हर बार की तरह
वैसे ही मानसून
दस्तक देता है..
किंतु!
अब इसने भिगोना
बंद कर दिया है
और अब बारिश के बीच
चलते हुए भी मुझे
छाते की ज़रूरत नहीं होती.......

Thursday, June 5, 2014

भ्रम का सौंदर्य

बड़ी बेशर्म, खुदगर्ज
और चालबाज़
होती है ज़िदंगी
जो
बड़ी आसानी से पुराने
अहसासों
रिश्तों
और किये हुए वादों
को भुला बढ़ती चली जाती है आगे..

नये जज़्बात, संबंध और
कसमों की परतें
बड़ी आसानी से उन
पुरानी चीज़ों पे डिस्टेंपर पोत देती है
और नई नज़दीकियों के
कारण खुद ब खुद
ज़िंदगी में चमक आ जाती है
हाँ!
भले ही उस डिस्टेंपर के अंदर
पड़ी रूह की दीवार में सीड़न आती
रहती है आहिस्ता-आहिस्ता...


पर ज़िंदगी कहाँ किसी को 
हमसफर मान ठहरा करती है
मिलन का मकसद ही जुदाई है
और वही है उसका अंतिम सत्य
किंतु
उस मिलन के
सौंदर्य से जन्मी चमक में
अक्सर
हो जाते हैं हम अंधे कुछ ऐसे
कि हर मिलन की शुभ्रता
हमें शाश्वत जान पड़ती है
और यही भ्रम दुनिया के हर यथार्थ
से अधिक खूबसूरत लगता है....

अफसोस!
स्वप्न चाहे कितना ही सुंदर क्युं न हो
भ्रम चाहे कितना भी प्रशस्त क्युं न हो
छाया कितनी भी शीतल क्युं न हो
स्थायित्व का वास उनमें कभी नहीं होता
साहिल पे आई समंदर की लहरें
हाथों को छूने वाली बारिश की बूँदें
और ज़ुल्फों को बिखराते हवा के झोंके
चंद लम्हों को ही खुशनुमा करते हैं...

पर हम
उन लम्हों की बेसुधी में ही 
खुद को किसी ख़याली शिखर 
का शिरोमणि समझ
अपनी ज़मीं से कदम उठा लेेते हैं
और अंततः
जीवन सफ़र की इस रहनुमाई में 
नित बदलते जज़्बातों के रंगों से
हमारे हाथ कोरे ही रहते हैं
और इस बेइंतहा बदलाव के चलते
इक दिन 
उन हाथो से उम्मीद की लकीरें
भी मिट जाती हैं।।
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