Friday, June 19, 2015

अव्यक्त की अभिव्यक्ति !!!

तप्त दुपहरी के बीच
ज्यों होती है तरुओं की
सुनहरी छांव।
भटका राही 
लंबी दूरी तय कर
पा लेवे ज्यों अपना गांव।। 

अथाह मरुस्थल में हो
ज्यों
भरा नीर का कुण्ड।
अथवा
किसी अनजान सफर पर
मिले अपनो का झुण्ड।।


ये सब वे चीज़ें हैं
जिनका लगता न 
कभी भी मोल
चमक नहीं, चाहत ही बस
तय करती इनका तौल।

बीच समंदर मिले थे तुम
बनकर के कोई द्वीप।
था संयोग अजब ये वैसा
मानो स्वाति में मिला
बूंद को सीप।

फिर निष्कंट राह में जाने
आयी कैसी ये विष बेल।
उड़ा ले गई मुझसे मेरा सब
क्या अजब ये कुदरत का खेल।।

कभी धूप-कभी छाया
क्या ऐसी ही जीवन की रीत।
क्युं वीराने में खो जाते
कभी महफिलों में गूंजे 
जो गीत।

हुई उपेक्षा उस अंचल में,
उम्मीद के थे जहाँ
खड़े किले।
मिला अंधेरा उन गलियों में
जहां प्रेम के 
दिये जलें।।

दूर सभी हों हसरत मेरी
हो न संग की अब ख्वाहिश।
वीतराग होकर वसुधा पे
न चाहूं कोई फरमाईश।।

हो उदार-निरपेक्ष वृत्ति बस
करुं स्वयं का आलोचन।
दिखे दोष अन्यत्र कहीं न
यही एक बस आलापन।।

तुम थे, तो ही सुख था
मृगतृष्णा हो मेरी ये दूर।
थमे खोज जगविषयों की अब
न होना ही चाहूँ 
 मशहूर।।

थमे  गीत-थमे हर कविता
अव्यक्त रहूं निष्चेष्ट सदा।
स्वस्वरूप में थिर होकर
लौटूं न जगत में कहीं-कदा।।
लौटूं न जगत में कहीं-कदा.....

Saturday, May 9, 2015

माँ

चित्र- गुगल से साभार

अपने छिले हुए घुटनों को देख
अब भी
बढ़ जाती है चाहत, 
उन गुजरे रास्तों पे लौटने की..
या फिर उन्हीं रास्तों पर किसी  जानवर को देख, 
होती है ख्वाहिश
कि पकड़लूं पल्लु जोर से एक मर्तबा फिर...
चाहता हूं उम्र के उस दौर में जाना
जहाँ टूटे खिलौनों पर, उजड़े  बिछौनों पर
बिजली चमकने पर या बादल गरजने पर
तुम बड़ी आसानी से कह देती थी
'कुछ नहीं हुआ'

और उस बात को सच मान
बड़ी से बड़ी आफत भी 
मुझे बौनी जान पड़ती थी..
अब भी सपनों के टूटन से, 
अपनों की रूठन पर
आँसू बहाने या किसी के सताने पर
मुझे उसी उंगली और 
मासूम थप्पी की ज़रूरत होती है
पर अफसोस
इन बचकानी हरकतों को
जमाना कहता है नासमझी मेरी
और बस इस लिये अब कुटिल, झूठा और कठोर हो 
मैं छुपा लेता हूं अपनी तमाम हसरतें

'माँ'...
मैं कुछ कहूँ या नहीं,
पर अब भी तेरी ज़रूरत 
जस की तस बनी है मेरे जीवन में।।।

Saturday, April 18, 2015

वो बिखरा आशियां !!! (50 वी पोस्ट)

उस रोज़
शायद कुछ यही तिथि होगी
जब हमने-तुमने की थी
अपने सुर्ख जज़्बात की रज़ामंदियां
और साथ ही हुई थी शुरुआत
उन सपनों के घरोंदो पर
दीवारें बनाने की।

और तकरीबन कर ही ली थी
कोशिश पूरी
उस तामीर को आशियां बनाने की
पर इससे पहले
कि डलती उसपे छत
कुछ समझौतों
रिवाज़ों
और कौमी फरमानों की...
ढह गई वो इमारत!
वर्ग-बिरादरी
और कुछ मिथ्या रस्मों की
आंधियों में।

हमारे कसमों-वादों
और अनगिनत अहसासों
का वो मिट्टी-गारा
अब भी वहीं पड़ा है
ज़मीं पर होकर भी
ज़मींदोज होने के इंतज़ार में।


और मैं, 
उस न बन सके आशियाने 
को जब भी देखता हूँ
उस रास्ते से गुज़रते हुए,
बस इक यही ख़याल आता है
कि ये क्या हो सकता था
और क्या हो गया।

तुम और मैं
अब भी जब-तब
उन आंधियों को ही
जिम्मेदार कहते हैं
उस बिखरे भवन के लिये..
बिना ये देखे-बिना ये जाने
कि
नींव हमारी ही कमज़ोर थी।


कहने को 
तेरी-मेरी अपनी ही दुनिया
अपना ही आशियां
और उसपे एक मजबूत छत है
पर उस भवन में
जाने क्युं?
मैं 'तुझे'
और तू 'मूझे'
ढूंढता है।

Tuesday, April 14, 2015

मुआवजा

उम्मीदों की चट्टान पर 
जब निष्ठुर हो
पड़ती हैं हालातों की बौछारें..
तो कतरा-कतरा
महीन हो
छलनी होता है सीना
हर उस किसान का,
जो अपने खून-पसीने से
उजाड़ पर भी पहना देता है
हरी चुनरिया।
कुछ वैसे ही
जैसे एक लाचार सपूत
अरसे की मेहनत के बाद
लाता है शहर से नई साड़ी
पहनाने को अपनी मां के
दुर्बल-विक्षिप्त बदन पे।

किंतु 
कोई पुरुष अथवा प्रकृति ही
हर ले चीर उस बूढ़ी औरत का
और बनाकर नंगा कर दे मजबूर
सहने उसे सर्दी-गर्मी, 
बारिश या चिलचिलाती धूप।
तो कसम से!
माँ से ज्यादा दर्द
उस पुत्र को होता है
जिसने अपनी संपूर्ण क्षमता से
की थी कोशिश मां के आंचल को
आवरण देने की।

किसान!
एक ऐसा ही पुत्र है
जो अपने समस्त
बल-बुद्धि और वक्त को लगा 
करता है कोशिश
इस धरा की गोद भरी रखने की
और अपने साथ मानवमात्र
के जीवन को संजोने की। 
किंतु कभी बेमौसम बारिश
कभी सूखा तो कभी कुछ और...
उसकी तमाम ख्वाहिशों को 
मेट देते हैं।

और जब अपने सर्वस्व के साथ
चित्र- गूगल से साभार
उम्मीदें भी हो जाती है दफ़न
तो खुशी के नहीं, 
सिर्फ खुदकुशी के रास्ते बाकी रह जाते हैं।
और फिर 
एक किसान की मौत पे
अनाथ बच्चे
विधवा बीवी
टूटे घर
असीम कर्ज
और उस उजड़े घर के
दर्जनों भूखे पेटों के लिये
मिलता है 'मुआवज़ा'
एक-दो या पांच लाख का।

कमाल है! ज़िंदगी
तो बड़ी सस्ती चीज़ है
वो मूर्ख किसान फज़ूल में
ही इतनी मेहनत करता था।

Sunday, March 8, 2015

औरत होने के मायने


उसने की जब-जब भी
इश्क़ की हसरतें मुझसे
मैंने बचकानी हरकतें बता

उन्हें धुतकार दिया।
उसने की जब-जब 
ख़्वाहिशें कहीं जाने की 
कुछ पाने की
मैंने बेहुदा जिद कह
उन्हें नकार दिया।
कभी रूठी वो मुझसे
तो कहा नखरा है ये
कभी मान गयी खुद ही
तो कहा स्वारथ छुपा है कोई।
और जब नहीं रही
कोई हसरत-जिद या ख़्वाहिश 
उसकी,
और कह गई अलविदा चुपचाप
मेरी ज़िंदगी से
तो उसकी इस अदा को कहा
बेवफाई मैंने।

हर वक्त ही तो मैं सही 
और गलत रही है, वो औरत!
कभी छोड़े चुटकुले उसपर
तो कभी बेबाकी से गाली देदी।
गालियों का लेन-देन कर रहे थे पुरुष
पर वहाँ भी बीच में थी
माँ-बहन या बेटी।

हाँ! कुछ वक्त के लिये
की थी मैंने भी मिन्नतें उससे।
जब महज़ जिस्म की आस में
किया होगा प्रेम का इज़हार...
पर इकरार-ए-इश्क के बाद
कहते हैं प्रेम किसे?
असल मायनों में सिखाया
मुझे उसने।

उसका हर इक करम
मुझे तिरियाचरित्तर लगा
पर उसका ये चरित्र
है किसके लिये 
मैं ऐसा कभी न समझ सका।
औरत कभी खुद के लिये नहीं जीती
उसके 'स्व' में वो अकेली नहीं होती।
गर इतनी सी बात मैं समझ गया होता
तो उसके दिल पे यूँ घाव न करता
भले छिन जाता मुझसे मेरा कुछ
पर उसके लिये मैं पुरुष जैसा बर्ताव न करता।

पर ऐसा हो न सका..
मैं आँखों में क्रोध लिये
एक कमजोर पुरुष रहा..
और 
वो आँखों में आंसू लिये
हमेशा एक मजबूत औरत।

अफसोस! मैं औरत न बन सका..
इस धरा के जिन परमाणुओं से
बनती है औरत,
वो परमाणु बस उतने ही हैं 
और न हो सकता है उनसे
कभी किसी पुरुष का निर्माण।

गर कभी-किसी रोज-कहीं पर
पा लिये मैंने थोड़े से गुण 
उस औरत के
तो मैं महज़ इंसान नहीं रह जाउंगा...
 उठ जाऊंगा
इंसानियत की ज़मीं से बहुत ऊपर।

(*विश्व की तमाम माँ-बहन-बेटी-पत्नी और महिलामित्रों को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं)
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