Sunday, December 7, 2014

सर्दियां

घरों से निकल गये हैं
बाहर सभी
अलाव, सिगड़ियां
और पेटियों में बंद पड़ी
कम्बल-रजाई।



कुहासे ने ले लिया है
सूरज की तीक्ष्ण आभा को भी
अपनी श्वेत धुंध के आगोश में।
और
पद्मपत्रों पर पड़ी
ओस की बूंदे भी
बन गई है सख़्त
बदलकर
बर्फीले मोतियों में।
पाला, तुषार और
बेहिसाब बर्फवारी...
कई उम्मीदों को भी
ढक देती हैं
ज़मीं की हरितमा की तरह।

सच,
मासूम से दिखने वाली
ये सर्दियां
भी बड़ी बेरहम मिज़ाज की होती हैं।


पर मेरे लिये नहीं,
क्योंकि मेरे अक्स में
दहक रहा है अलाव
तेरी हस्ती का।
और गुजरे लम्हों की
आंच,
सुलगा देती है मुझे
रह-रहकर।



वो तेरे सिरहाने
होने वाले मेरे हत्थु-तकिये
फिर करना नुमाईश
बांहों के कम्बल की।
और ऐसे ही वो खरीदे हुए
ढीले स्वेटर
जो एक में ही देते थे
पनाह हम दोनों को।
अब भी,
दूर से ही
मेरी सर्दी भगाते हैं.....


'सर्दियां'
जमाने को जमाती होंगी
अपनी सर्द लहरों से...
पर मैं,
बीते लम्हों से मिली
यादों की तपन से
हर पल पिघलता हूँ।

Sunday, November 16, 2014

मुझमें 'तू'

जीवन की बासलीका दौड़ में

कुछ बेदस्तूरियां भी
होती है ठहरी
कहीं
हमें बताने को
कि
हम भी बिखरे हैं
औरों की तरह।

रस्मों-रिवाज़
और पूरी संजीदगी से
ये ज़िंदगी बिताने पर भी,
कुछ तो है
कैद इस सीने में
जो जीने नहीं देता..
मुझे पीने नहीं देता
उमंगो का प्याला।

बदन में चुभी फांस की तरह
न लौटी हुई सांस की तरह
उधड़े हुए लिबास की तरह
न मिटने वाली प्यास की तरह
जो रुका हुआ है मुझमें!
वो कोई और नहीं
तुम ही तो हो...

हाँ! वो तुम्ही तो हो
जिसने अपनी हिरासत में
मेरी रूह को रख
जिस्म को खुल्ला छोड़ा है।
तुम ही तो हो
जिसने अदृश्य तंतु
से खुद को बांध,
मुझसे
बस कहने को नाता तोड़ा है।

और बस इसलिये ही तो
आईने के सामने होता हूँ मैं
पर दिखते हो तुम,
अनजानी राहों पे भटकता हूं मैं
पर मिलते हो तुम।
यादों की लू में झुलसता हूँ मैं
पर खिलते हो तुम,
और कुछ ऐसे ही
खुले पड़े ज़ख्मों को भरता हूँ मैं
पर फिर भी रिसते हो तुम।।

कई कोस का फासला 
इकदूजे के बीच रखने के बावजूद
'तू'
ले रही है सांसे 
मेरे ही अंदर
किसी परजीवी की भांति..
और मुझसे मेरी ही शिनाख्त
छीनकर
हुई है पल्लवित
'तू'
कोई हाल ही में खिला
गुलाब बनकर।
अपनी बुद्धिमत्ता से 
यूं तो 
सुलझाये हैं कई सवाल मैंने
पर इक तू  है
जो थमी है मुझमें ही कहीं
कोई उलझा हुआ 
जबाव बनकर।।

Wednesday, November 5, 2014

तुझमें 'मैं'

हाँ भुला दो..
है छूट तुम्हें पूरी
कि अब तुम भुला ही दो।
अब तो धुंधली पड़ ही गई होंगी
वो स्मृतियां...
जिसमें तुम साथ थे
हाथों में लिये हाथ थे
रुहानी जज़्बात थे।

हाँ भुला दो न!
बार-बार ये जताने से अच्छा है
एक बार भुला ही देना
और कर देना
अजनबी मुझे
पीछे छूटे किसी दरख़्त की तरह।

तुम्हारी इन लाख कोशिशों के बावजूद
मैं फिर उभर आऊंगा..
जब पेड़ से पत्ता कोई झरेगा
जब हवा का झोंका कोई
ज़ुल्फ तेरी छूएगा 
या महफिल में कभी
गीत कोई बजेगा।

इन असंख्य हरकतों से
जो भी कुछ तेरी रूह में
उभरा होगा..
कोई अहसास बनकर
लिबास बनकर
या अनकही सी प्यास बनकर
वो 'मैं' ही हूँ।
क्यूंकि तेरे लाख आगे बढ़ जाने 
के बावजूद
मैं चस्पा हूँ तुझमें कहीं
इक खरोंच बनकर।

सुन!
जिन खुशियों ने आज 
थामा है तेरा दामन
वो कुछ और नहीं
दुआएं हैं मेरी...
और ऐसे ही जो जितना भी
ग़म मिला है बरकत में तुझे
वो मेरे न होने का ही असर है
करीब तेरे।
क्यूंकि मेरी नज़दीकियां उसे 
भी फ़ना कर देती इक चुटकी में।

मैं, मैं, बस मैं ही तो हूँ
आंख से गिरी उन पानी की बूंदों में
जो आ जाती हैं बाहर
अक्सर तन्हाई में,
दिल के समंदर में उठे
ज्वार के कारण
और
मैं ही हूँ
लवों पे बिखरी
उस मुस्कुराहट में,
जो मेरा ख़याल आने पर
आज भी तेरे गालों को लाल
कर देती हैं।

तेरा अक़्स बेवफाई कर
हो सकता है जुदा तुझसे
पर मैं,
मैं अब भी उलझा हूँ
तुझ में कहीं
इक सुलझा हूआ सवाल बनकर।

Friday, October 24, 2014

खुरचन

अक्सर फ़िजूलखर्चियां
ख़त्म कर देती हैं
बेशकीमती चीज़ों की
अहमियत को।

और 
ये फ़जूलखर्चियां
यूंही ज़ाया कर देती हैं
बेहद खास चीज़ों को
जब वो
अपने फटे-पुराने
सड़े-गले रूप में 
मिलती है किसी को
उतरन बनकर
या किसी थाली में
बची हुई खुरचन बनकर।

अपने तमाम
वक्त, होश और जोश-ओ खरोश
से मैंने खर्च दिये हैं
अपने वे तमाम महीन जज़्बात
जिन्हें पाने की तमन्ना में
तुम मेरे दिल पर अर्जियां दे रही हो।

बेशक हो जाओगी तुम
मेरी ज़िंदगी का हिस्सा
पर बरहमिश,
इक हिस्सा ही रहोगी
न बन सकोगी
ज़िंदगी मेरी।
क्युंकि
यौवन के विहान में
जमकर की हैं मैंने भी
अहसास-ए-इश्क़
की फ़िजूलखर्चियां।

अब इस दोपहर
में तुम आये हो
तो तुम्हें झूठन के सिवा
और क्या मिल सकता है?
लो खरोंच लो!
तुम्हारे सामने पड़ी है
मेरे दिल की तश्तरी
और मिटा लो,
गर मिटा सको
तुम इससे क्षुधा अपनी।

जज़्बातों की बेशुमार
बरबादी और
अंधखर्चियों से
ये खजाना अब
तहखाने में बदल गया है।
और अब
दस्तक के लिये 
तुमने जो दर चुना है
वो दर तुम्हें
न दे सकता है कुछ भी.......
'चाह' की उतरन के सिवा,
'इश्क़' की खुरचन के सिवा।।

Friday, October 10, 2014

नासूर ज़ख्म

गर ज्वालामुखी से

निकल लावा जमीन तक पहुंचे
तो जमीं के नित स्पर्श से पा जाता है
वो मृदुता
पर रह जाये वो
यदि तह के नीचे ही कहीं
तो धधकता है शोला बनकर।


ये ज़मीं पे बिखरे
शैल,
गर अपरदित होकर
बिखरे जहाँ-तहाँ 
तो पा जाते हैं
वो ऋजुता,
पर उतर जाये गहरे
यदि ज़मीं के अंतस में
तो हो जाते हैं ठोस वे
अपनी काया बदलकर।

कुछ ऐसे ही
वदन के ज़ख्मों पर
पड़ जाये पपड़ी
रक्त का प्रवाह ठीक हुए बगेर,
तो हो जाते हैं
वो नासूर
हमें रह-रहकर तड़पाने के लिये।


जज़्बातों के छले जाने से
उभरी है जो पीड़ा,
गर निकल जाती वो
चंद अश्क़ों के बहाने से
तो न रूह में शोले जलते
न ज़ख्म नासूर बनते
और न घटती
मानवीय संवेदनाएँ मेरी।

पर ऐसा न हो सका
अब जो है
वो, वो नहीं है
जिससे तुम्हें प्यार था
जज़्बातों के मृदु शैल
कायांतरित हो
बन चुके है इक ठोस धातु।
और इनकी लगातार सड़न ने
ज़ख्मों को भी नासूर कर दिया...
सुनो!
अब मेरी खैर-खबर पूछ
उन ज़ख्मों पे पड़ी पपड़ी मत
उखाड़ा करो।

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