Saturday, December 14, 2013

सूरत और सीरत

क्यूं मसले जाते हैं
कोमल फूल
क्यूं चढ़ती है
सुनहरी परतों पे धूल
तितलियों को
कहो आखिर
खूबसूरती का
क्या सिला मिला है
वासना का हर तरफ
जब बढ़ रहा यूं
सिलसिला है...
सच,
अच्छी सूरत भी क्या
बुरी चीज़ है..जानम!
जिसने भी देखा
बुरी नज़र से देखा।।

क्यूं माफी को कमजोरी 
समझे ये दुनिया

क्यूं झुकने को बेवशी
माने ये दुनिया
वृक्ष चंदन के ही आखिर
कटते हैं क्यूं इस जहाँ में
नेक फितरत का न जाने
मोल आखिर क्यूं जहाँ ये...
सच,
अच्छी सीरत भी क्या
 बुरी चीज़ है..जानम!
जिसने भी पायी
ठोकर ही खायी।।

Saturday, November 30, 2013

आदमी की पहचान

वो
दिखाने के लिये
प्रेम,
रहम और अपनापन
पूछते थे सदा
आदमी की पहचान...

और

उस पहचान के
लिहाज से ही होती थी
उसपे बरकत
उसकी खिदमत
और कीमत
क्युंकि
इस जहाँ में
होना काफी नहीं है
सिर्फ एक इंसान,
पूछते हैं तुमसे
हो तुम हिन्दु 
या फिर मुसलमान
पर असल में
नहीं है
ये भी
आदमी की पहचान...

उसकी शख्सियत के
बस रह गये हैं कुछ नाम
वो या तो है
बेवश
भूखा
लाचार
या परेशान...........।।

Saturday, November 16, 2013

बोलते आँसू



आँसू
हैं तो महज पानी
जो दिल की आग से 
बाहर आते हैं
और
बाहर आके दूसरों के
दिलों को जला जाते हैं।
आँसू
है तो खामोश पानी
लेकिन ये भी कमबख्त
चीखते हैं
चिल्लाते हैं।

लेकिन ज़िंदगी में
न सब समझ सकें
इन आँसूओं की 
भाषा
जो होते हैं दिल के पास
बस, वही जाने
असली परिभाषा..

कभी दिल के दर्द को
संग अपने बहा ले जाते हैं ये
कभी उस दर्द को
और गहरा बना जाते हैं ये...

इन आँसुओं में 
भावनाओं का सैलाब है
इन आँसुओं में छुपे
कई हसरतों के ख्वाब है
इन आँसुओं में हैं सवाल
और इन्हीं में सारे जवाब हैं
लेकिन जिंदगी में है कौन वो
जो समझे इन आँसुओं की भाषा
है कौन दिल के पास
जो जाने इनमें छुपी परिभाषा...

लफ्ज़ जब लाचार हो जाते हैं
तब आँसू ही बयाँ करते हैं
दिल की हरकतों को
आँसू ही हैं जो जोड़ें
टूटे हुए सिलसिलों को..

तड़पता हुआ दिल
सिसकती हुई आँखों से
बयाँ करता है अपनी
बेचैनियाँ,
और उस सिसकन से
भीग जाते हैं 
तकिये रातों में...

ग़नीमत है ये आँसू 
बेरंग होते हैं,
नहीं तो सनम!
ये तकिये दिल की
सारी दास्तान
चुगल देते जमाने से.......

Wednesday, October 30, 2013

रोशनी की चकाचौंध

क्यूं
अफसोस करें हम
कि कुछ भी न होता 
मन का मेरे
क्युं तन्हा
रहे हम हरदम
कि जीवन को घेरे
घनघोर अंधेरे...


क्युं
अपने नसीब को कोसें
कि जो चाहें
वो मिले न हमको
क्युं नाराज़
खुदा से हों
जब सुकुं मिले
न आवारा दिल को...

यूँ अफसोस जताके
हम,
तौहीन करें
अपने जीवन की
तौहीन करें
अपनी साँसों की,
और
वक्त के मृदु संगम की..

सच तो ये है
सनम! सुनो तुम
मिले वही
जिसके लायक हम
गर हो जाये 
सबकुछ मन का
तो 
बात याद रखना वो पुरानी
जिसे सुनाया करती थी,

अक्सर वो काकी
बड़ी सयानी...
कि 
जिंदगी हमारे धीरज का
इम्तिहान,
युंही बस लेती है
और
ज़रूरत से ज्यादा
रोशनी भी
अंधा बना देती है।

Thursday, October 17, 2013

भावुकता बनाम संवेदनशीलता

अक्सर
लोगों के ठहाके देखकर भी
मुझे हँसी नहीं आती
अक्सर
जमाने में दर्द देखकर भी
मेरी अंखियाँ आँसू नहीं बहाती..
अक्सर
सुंदर खूबसूरत नगमों पे भी
मैं झूमता नहीं हूँ
अक्सर
सुनहरी यादों के साये में
मैं घूमता नही हूँ।


इस कद़र मेरी बेरुखी देख 
वो आसानी से कह जाते हैं
कि मुझे प्यार नहीं है
किसी का इंतज़ार नहीं है
इक सलोना दिल नहीं है
खुशनुमा महफिल नहीं है...

पर,
करूँ भी मैं क्या

इसमें कसूर न कोई उनका
वो मेरे लफ्ज़ सुनते हैं
खामोशी नहीं!
और
 मेरी ख़ामोशी
बड़ी खामोशी से
ये बताना चाहती है
कि सनम!
क्षणिक भावुकता 
और परिपक्व संवेदनशीलता में
फ़र्क होता है.....

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