Friday, October 4, 2013

ख्वाहिशें

ख्वाहिश,
तुम्हें पाने की
दुनिया घुमाने की
    दिल में सजाने की।

ख्वाहिश,
आँसू बहाने की
खुलके मुस्कुराने की
बतिया बनाने की।

ख्वाहिश,
गीत गुनगुनाने की
झूमने-झूमाने की
दूनिया पे छाने की।

दिल के ज़र्रे-ज़र्रे में
ये ख्वाहिशें समायी
ज़िंदगी में छायी..
पर,
नादान ख्वाहिशें ये
हालात नहीं जाने
न अपनों की माने
दस्तूर जमाने के
न तनिक भी पहचाने।


हैं रिवाज़ों के बंधन
हज़ारों हैं अड़चन
लोगों की बातें
बढ़ाती हैं तड़पन।


फिर भी ये ख्वाहिशें
बढ़ती ही जाती
चैन नहीं पाती
कितना सताती

सच, 
ये ख्वाहिशें
बड़ी बदतमीज होती हैं।।

Tuesday, October 1, 2013

प्यार से बचाना

ज़ख्मी,
अब हो गई है
मेरे सोचने की शक्ति,
दिमाग के सारे पट भी
अब बंद हो गये हैं..
हूँ मैं मंदबुद्धि कितना
लगाके दिल
ये तुझसे जाना...
ओ सनम!
इस दिल और दिमाग की
तकरार से बचाना
तेरे प्यार से बचाना।



मेरे दिल के किनारों से
कूटती हैं हरदम
जाने क्यूँ अपना माथा
तेरे चाहत की तरंगें..
मुझे इस मोहब्बत के
ज्वार से बचाना
तेरे प्यार से बचाना।

निंदा की आंधियाँ
न डिगा सकती है मुझे किंचित,
परेशां हैं मुझे करते
तेरी तारीफों के थपेड़े..
इश्क में होने वाली
इस
खुशामदी की बहार से बचाना
तेरे प्यार से बचाना।


गर प्यार है तो उसको
दिल में ही दबा रखना
असहाय खुद को पाता
तेरी बातों के भंवर में..
बस इसलिये ही करता
हूँ गुज़ारिश ये तुमसे
हरदम!
मुझको बहकाने वाले
इस इजहार से बचाना
तेरे प्यार से बचाना।

Thursday, September 26, 2013

जिंदगी और मुस्कुराहटें


माना 
कि जिंदगी में
ग़म बहुत हैं

माना
कि आँखें
नम बहुत हैं
माना
कि दिल के दरिया में
दर्द भरा है
माना 
कि हर तरफ बस
बेवशी का पहरा है...


फिर भी सनम!
तुम्हें मुस्कुराना है
ऐ हमदम!
अपने ग़म को हराना है
जिंदगी को महज
गुजरे हुए लम्हों से
लंबी नहीं,
बल्कि
मुस्कुराहटों से
बड़ी बनाना है...


क्युंकि प्रियतम!
जिंदगी भी
बगिया की तरह होती है
और
बगिया को
राहों में बिखरी हुई
पत्तियों से नहीं
खिले हुए
गुलों से आंका जाता है।।

Thursday, September 19, 2013

फर्क नहीं पड़ता

हालात के थपेड़े
जब इस दिल को घेरे
हो हर तरफ जब छाईं
रुसवाईयां
तन्हाईयाँ
दिल में बढ़ रही हो
दर्द की गहराईयाँ...
जब रिश्ते हो टूटे
अपने हो छूटे
चैन कोई लूटे
और बढ़ रही हों पल-पल
लाचारियाँ
बेचारियां
दस्तक दे रही जब
दर पे बेताबियाँ...



फिर भी दिल क्यूँ जाने
आँसू नहीं बहाता
टीस न जताता
दर्द न बताता
जीता ही जाता
बस मुस्कुराता
जाने क्यूँ ये बात
लफ्ज़ पे न लाता...
है टूटा हुआ दिल

बढ़ रही है मुश्किल 
छूटा है साहिल
पर बेशर्म जुवाँ ये
 कैसे कह लेती
कि मुझे कुछ-
'फर्क नहीं पड़ता'

Wednesday, September 4, 2013

खून के घूंट


न जाने कैसे
मर जाते हैं लोग 
भूख से,
प्यास से,
यूँ ही किसी की
आस से,
जबकि 
जीने के लिये
नहीं करना कोई
मशक्कत
और न ही
कोई हरकत..
बस यूँ ही
बैठे-ठाले
न जतन कोई 
निराले
किये बगेर
जी सकते हो 
आप,
बिना 
दाना-पानी के
लगातार 
पीते हुए
खून के घूंट......
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