Thursday, September 19, 2013

फर्क नहीं पड़ता

हालात के थपेड़े
जब इस दिल को घेरे
हो हर तरफ जब छाईं
रुसवाईयां
तन्हाईयाँ
दिल में बढ़ रही हो
दर्द की गहराईयाँ...
जब रिश्ते हो टूटे
अपने हो छूटे
चैन कोई लूटे
और बढ़ रही हों पल-पल
लाचारियाँ
बेचारियां
दस्तक दे रही जब
दर पे बेताबियाँ...



फिर भी दिल क्यूँ जाने
आँसू नहीं बहाता
टीस न जताता
दर्द न बताता
जीता ही जाता
बस मुस्कुराता
जाने क्यूँ ये बात
लफ्ज़ पे न लाता...
है टूटा हुआ दिल

बढ़ रही है मुश्किल 
छूटा है साहिल
पर बेशर्म जुवाँ ये
 कैसे कह लेती
कि मुझे कुछ-
'फर्क नहीं पड़ता'

22 comments:

  1. बहुत उम्दा नज़्म है है सर

    अलतमश

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    Replies
    1. शुक्रिया अल्तमश।।।

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  2. बहुत उम्दा लेख आभार

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  3. लाचारियाँ
    बेचारियां
    दस्तक दे रही जब
    दर पे बेताबियाँ...

    .......बहुत ही बेहतरीन रचना
    प्रभावी प्रस्तुति...

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  4. उम्दा-प्रभावी प्रस्तुति...

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  5. Replies
    1. धन्यवाद धीरेंद्रजी..

      Delete
  6. कहते हैं, Tears are safety valves of the heart, इसलिए कभी कभार बह जाएँ आंसू तो उन्हें बहने भी देना चाहिए...!

    सुन्दर रचना!
    शुभकामनाएं!

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    Replies
    1. सही कहा अनुपमाजी..शुक्रिया आपके उत्साहवर्धन हेतु।।।

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  7. सुन्दर रचना!
    शुभकामनाएं!

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया मलिक साहब।।।

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  8. Replies
    1. धन्यवाद..आता हूँ आपकी चौखट पे...

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  9. आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 26/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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