Sunday, January 22, 2017

ब्रेक-अप


अपने ख़याली घोड़ों को
जब दौड़ाता हूँ
उस गुजरे अतीत के सफ़र पर,
जहाँ नाजुक अहसासों के शलभ
लामबंद हो
सहलाते हैं...
खुश्क़ हो चुके
ज़िंदगी के कपोलों को।

इस गुज़रगाह में
मिलते हैं वे मुकाम
जब मिले थे हम
जब खिले थे हम
और 
बदली थीं आपस में
हर्ष-विषाद से भरी
अपनी रजामंदियों की 
पोटली।

संयोग-वियोग की 
नियति को 
भलीप्रकार जानते हुए
था यकीन तब भी,
इकरोज़ हो जाने वाले
बिखराव
का भी अपने।

लेकिन, 
संबंधों के दरमियां होने वाले
इजहार-इकरार और इंतज़ार
जैसी घटनाओं के समान ही
लगता था मुझे 
कि होते होंगे कुछ बिछोह के भी संस्कार...
होंगी कुछ नियमावली, औपचारिकताएं,
विधि, प्रथा, व्यंजना या रस्मो-रिवाज़
जिनमें होता होगा
नजदीकियों की ही तरह
दूरियों का भी करार।

उस संस्कार को
शायद 'ब्रेक-अप' नाम दिया है
आज की संस्कृति ने।
हाँ...उसी संस्कृति ने
जिसका हिस्सा होते हुए भी हम
उसकी नीतियों से ऐतराज़ किया करते थे।
और इसलिये,
इस अति ज़ाहिर होने वाले वक्त में भी
गोपनीय रखा था अपना 'प्रेम'।


पर देखो न
उस विच्छेद की रस्म को 
निभाये बगैर ही
पसर गईं रिश्ते में 
फासलों की दरारें।
कहो न!
भला देखा है कहीं
ऐसा
बिना 'ब्रेक-अप' का अलगाव।

Wednesday, October 5, 2016

सत्व का सत्य

असंख्य ग्रह, नक्षत्र
और आकाशगंगाओं के बीच
ढूंढता हूँ कभी-कभी
अपनी भी
अदनी सी हस्ती।

तलाशता हूँ उन कारणों को
जो किसी संयोग में खुशी
और वियोग में दुःख को बढ़ा देते हैं।
जब किसी चीज़ को पाकर
हो जाता है खुद पे गुमान
इस बृह्मांड से भी बड़ा होने का...
और कभी कुछ खोकर
बन जाता हूँ क्षुद्र
कि
अपने सत्व को
समझने की भी खो देता हूँ
लायकात 'मैं'।

देखता हूँ
जब जीवन वृत्त की
परिधि को
और
उसमें घट रही
घटनाओं की
अविरल संतति को...
तो कर देता हूँ व्याख्याएं
उनके अच्छे या बुरे होने की।
सिर्फ
मौजूदा अंश के प्रभाव में
आकर,
बिना समझे अनंत के प्रवाह को।।

परिधि की ये नजर
मुझे वृत्त के केन्द्र से दूर कर देती है
जो ठहरा है वहीं
मुकम्मल तब्दीलगियों के बीच।

वृत्त के उस केन्द्र के ही साथ
रह जाता हूँ मैं महरूम
'तथ्य' के भीतर छुपे 'सत्य' से
क्योंकि
घटनाओं में निहित तथ्य को
समझने से ही पहले
की गई उन व्याख्याओँ ने ढंक दिया
उस सत्य को हमेशा के लिये।

सहसा के भंवर में
सनातन छूट जाता है...
और मैं इतराता हूँ
इन त्वरित उपलब्धियों पे,
उन्हें देख ही हंसता हूँ
रोता हूँ उन्हीं से।

कभी रुसवाईयों में
या चरम तन्हाईयों में,
अपेक्षित से उपेक्षित होने के बाद
होता भी है भान
संयोगों की ध्वंसात्मक
प्रकृति का...
तब भी वो विरक्ति का आवेग
भ्रामक सुख-संयोगों से
विभक्ति की वजह नहीं बन पाता।

और फिर
इस व्यक्त के व्यामोह में
जो वाकई 'व्याप्त' है
वो अनेदखा ही
रह जाता है नज़र से।

बदलते
ग्रह, नक्षत्र
दिवस, मास और वर्ष में।
टूटती
अनंत उल्कापिंडों के
दरमियाँ।

वो बना ही रहता है ओझल...
जो ठहरा है
अपनी धुरी पर
अचल, स्थायी और सिद्ध।
बस, इसीलिये
इस बदलाव के बीच,
मुझे भी बदलना पड़ता है।
आना पड़ता है
धरा पर
रूप बदल-बदलकर।

Saturday, September 24, 2016

एक और जनम

स्वपन से बंधा हुआ
बढ़ चला तना हुआ
प्रवाह को न देखता
जाने क्या-क्या सोचता
वक्त यूं फिसल गया
हाथ से निकल गया
पर बने रहे भरम।
लो चला इक उर जनम।।

आस की जकड़ रही
बस, व्यक्त की पकड़ रही
दृश्य के अवभास में
अनकही इस प्यास में
अव्यक्त ओझल ही रहा
मानस ये बेकल ही रहा
न कट सके किंचित करम।
लो चला इक उर जनम।।

प्रेम की डगर मिली
संबंध की भंंवर मिली
'रस सिंधु' जिसे मैं समझ
लो गया उसमें उलझ
कल्पना के लोक में
झूठे हरष और शोक में
करता रहा यूं ही भ्रमण।
लो चला इक उर जनम।।

मोह की सुरा जो ली
टूटती शिरा रही
यूं नजर के सामने
जिसको चला मैं थामने
न वो झुक सका
न रुक सका
टूटती गई शरम।
लो चला इक उर जनम।।

Tuesday, September 20, 2016

सरकता क्षितिज

मेरी बेइन्तहां तमन्नाओं
की बयार में इक तू भी थी शामिल।
तुझसे नहीं थी तमन्नाएं सब
तू बस एक थी उन तमन्नाओं में...

इन हसरतों का सैलाब
आज का नहीं
ये तो उन असंख्य जन्मों से है
मेरे पीछे
जिनका क्षितिज
खोजते-खोजते
मैं आ पहुंचा हूँ यहाँ भी।

ये हसरतें कई मर्तबा
पूरी हो जाने के बाद भी
बरकरार रहीं हैं ज़ेहन
के किसी कोने में
अपना रूप बदल-बदलकर।

कभी दौलत की, कभी शोहरत की..
कभी संयोग की तो कभी किसी वियोग की भी
हसरतें ही तो हैं ये सब।
जो बच्चे होने पर खिलौनों के लिये
तो बड़े होने पर रिश्तों के लिये मचल उठती हैं...
और फिर घिर जाता हूँ मैं
इन असीम तमन्नाओं के भंवर में
कि जिनसे घिरा होने पर
मुझे, बंद हो जाता है
दिखना
अपना ही वजूद।


इस बेलगाम दौड़ में

सदा
रास्तों के बीच ही
मैं नजर आता हूँ....
चलता हूँ जितने कदम भी,
पर मंजिल को
खुद से उतने ही दूर पाता हूँ।

दूर किनारे पर कहीं
दिखता है मिलन
जमीं और आसमाँ का जो हमें
वो धोखा महज़ नज़रों का नहीं
नजरिये का भी है दरअसल।
जो हम उस जोड़ को छूने
की हसरत लिये
भागे जाते हैं क्षितिज की ओर।

इस जोड़ को पाने की तमन्ना संग
मैं जितना भी दौड़ां
जितना भी भागा
उतना ही दूर
सरकता गया 
वो 'क्षितिज'


Saturday, May 14, 2016

वो लाड़ला बेटा

उस रोज़ जब
रेलवे स्टेशन पर
वो आई थी छोड़ने
अपने इकलौते बेटे को
तो
उसने अपने दोस्तों के आने से पहले
कहा था अपनी माँ से
लौट जाओ तुम यहाँ से।

माँ की फटी साड़ी,
पैरों में घिसी चप्पल
और उसका थका चेहरा
पहुंचा रहा था शायद
उस बेटे की
इज्जत को ठेस।

पर वो बेशर्म माँ,
देखना चाहती थी
अंतिम घड़ी तक 
अपने लाड़ले बेटे का मुखड़ा
ट्रेन के छूट जाने से पहले।

एक थैली में
अचार-पापड़ का डिब्बा,
बेसन के लड्डू
और कुछ पूड़ियों के संग
रखी थीं उसने गर्मी से बचने की हिदायतें
उस रोज़।

पर, 
इन तमाम हिदायतों से परे
वो बस भगा देना चाहता था 
अपनी माँ को उस स्टेशन से दूर।

फिर क्या,
अपने बेटे की जिद से मजबूर
वो माँ चल दी वहां से
पर जाते-जाते भी कहती रही
कि न निकलना धूप में बाहर
न खाना होटलों का बासा खाना
और लौट आना परीक्षा के बाद तुरंत ही।

माँ की इन नसीहतों पर झल्लाकर
आखिर उसकी जुवां ने यह कह ही दिया
'मैं कोई बच्चा नहीं..अब जाओ भला यहाँ से'

कुछ रोज़ बाद
शायद मदर्स डे पर
की पोस्ट फेसबुक पे उसने,
माँ के साथ ली गई एक सेल्फी...।
और किसी शायर की शायरी के साथ
लिखा नीचे उसके
"वर्ल्ड्स बेस्ट मॉम"
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