Friday, October 31, 2025

दाग-धब्बे


 

धब्बे

कुछ होने का शंखनाद है

और हैं गवाही फतह की


सफलता की उजली सतह पर

हैं संघर्ष का काला टीका


धब्बे

गोरे कपोल का हैं काला तिल

और सुफेदी के प्रेमी


हैं ये

जीवन का ऐलान

क्योंकि

कफ़न पे नहीं होते धब्बे।


हर जागते

भागते

कुछ कर गुजरते इंसा

के हैं मुरीद

पर

मुर्दों से दूर 


दाग धब्बे


हर उजास का

नेपथ्य

हर खामोशी का

कथ्य।


3 comments:

  1. वाह भाई साहब

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  2. यह कविता सचमुच सोचने पर मजबूर करती है। आपने धब्बों को कमजोरी नहीं, बल्कि संघर्ष और जीते-जागते जीवन की पहचान बना दिया। "कफ़न पे नहीं होते धब्बे" वाली पंक्ति सबसे ज़्यादा असर छोड़ती है, क्योंकि वह बहुत गहरी बात बेहद सरल शब्दों में कह देती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

    ReplyDelete

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