Sunday, April 13, 2014

सितम

रातों में जगाकर
यहाँ-वहाँ घुमाकर
और अपनी
ज़िदों से तड़पाकर
मुझे थकाते थे
वो
सितम ढाते थे..



क्या-क्या सुनाकर
बतिया बनाकर
आँसू बहाकर
मुझको सताते थे
वो 
सितम ढाते थे...

सितम उनके सहके
हम मजबूर हुए
और
थकके चूर हुए
पर फिर भी न वो माने
जो आ गये जताने
कि
ये भी कोई सितम थे
ये तो बहुत ही कम थे...


और...फिर आखिर
उसने असली सितम ढाया
जो हमको न बताया
और इससे पहले कि
ये खुद को हम बताते
वो युं ही चले गये
और..
अब वो न कोई सितम ढाते..

पर जाने से पहले..सुनते जाओ
ऐ सितमगर!
तुम्हारे यूं 
सितम ढाने का
न हमको था कभी ग़म..
पर तुम्हारा
सितम न ढाना ही है
सबसे बड़ा
'सितम'

20 comments:

  1. बहुत खूब !! मंगलकामनाएं . . . .

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया सतीशजी..

      Delete
  2. Replies
    1. जी आभार..आता हूँ आपके द्वारे।।।

      Delete
  3. वाह...बहुत खूब...

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद कैलाश जी...

      Delete
  4. शब्दों के जाल मे क्या खूब पिरोया है झलकियों को...आपकी यह रचना काबिलेतारीफ |

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद संजय जी..

      Delete
  5. उनके सितम भी कहाँ सितम थे ... आये थे तो कर ही जाते कुछ सितम ... कुछ फूल हो जाती जिंदगी ... बहुत खूब ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. सही कहा नासवा जी..शुक्रिया प्रतिक्रिया के लिये...

      Delete
  6. सुंदर और भावपूर्ण...

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया आपका...

      Delete
  7. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Post Comment